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ये इश्क़ के रिश्ते है जाना.....यहा कोई सबूत नहीं होते है
बरसो से.......बस यकीन पर ही तो टिके है......ओर पढे

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माँ तेरे दूध का हक मुझसे अदा क्या होगा
तू है नराज तो खुश मुझसे खुदा क्या होगा।ओर पढे
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झूठ बोलते है वो जो कहते है
हम सब मिट्टी से बने हैं
में कई अपनो से वाकिफ हु
जो पत्थर के बने हैं।ओर पढे
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ये दिल ही है जिसे हारने की आदत हो
                  गई हैं,
वरना जहा भि हमने दिमाग लगाया
       फतह ही पाई हैं। ओर पढे
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#IndiaFightsCorona

दूसरों से उचित दूरी, सबकी सुरक्षा के लिए ज़रूरी। सभी सार्वजनिक स्थानों पर इसका पालन करें। इस जानकारी को साझा करें और अपनी सुरक्षा के लिए हमारी मदद करें। ओर पढे
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तू चांद सा शीतल नही ये पता है मुझे
मेरा सूरज हैं तु अब जलना है मुझे

तेरे ताप की तरफ मुख करू हा तेरी
सूरजमुखी मुहब्बत बनना हैं मुझे।
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कुछ रिश्ते कुछ ख्वाब
                 कुछ तस्वीरें जाने क्यों
अधूरे छूट जाते है। ओर पढे
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मोहब्बत तो बेपनाह करते हैं मुझसे
     पर जताना नही आता
तुम समझ नही पाये हमारी चाहत
ओर हमे बताना नही आया। ओर पढे
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एक ही शख्स होता हैं पूरी कायनात में
राहे इश्क़ में कभी काफिले नही होते...।ओर पढे
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एक दिमाग वाला दिल मुझे भी दे दे खुदा
ये दिल वाला दिल बस तकलीफ ही देता है। ओर पढे
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प्रेम क्या है
           एहसास किया है कभी..
इसमे प्राप्त कुछ भी नहीं
                बस समपर्ण पूर्ण बिना
बिना स्पर्श किये 
उनको जी लिया जाता हैं
  शब्दो के एहसासो के साथ।ओर पढ़े
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पसन्द का शूट ना मिलने पर पूरे घर को सर पर उठाने
वाली लड़कियाँ माँ बाप की खुशी की खातिर पूरा
जीवन नापसंद इंसान के साथ गुजर देती हैं। ओर पढे
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रहने दे ये फासले ही अब हमारे
                दरमियाँ
हमारी नजदीकियों में अब वो
           बात नही रही। ओर पढे
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अरमा तमाम उम्र के सीने में दफन है
हम चलते फिरते लोग मजारो से कम नहीं। ओर पढे
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वो मेरे साथ रहकर भी....था...उदास
 तो राब्ता-ए-इश्क खत्म....कर दिया मेने। ओर पढे

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में खामोशी तेरे मन की, तू अनकहा
               अल्फाज मेरा....
    में एक उलझा लम्हा तू रूठा
             हालात मेरा....ओर पढे
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उठाकर कफ़न ना दिखाना चेहरा मेरा उसको
                उसे भी तो पता चले कि

यार का दीदार न हो तो कैसा लगता हैं
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घाटे ओर मुनाफे का बाजार नही है
इश्क़ इबादत है कारोबार नही है ओर पढे

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प्रेम शब्दो मे नही, अहसास में दिखता है

प्रेम का कोई शास्त्र नही है।
न कोई
परिभाषा है
 न प्रेम का कोई सिद्धांत है

प्रेंम तो एक अहसास है जो इसे महसूस कर सकता है
वही प्रेम को देख सकता हैं। ओर पढे
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दिल की खामोशी से सासो के रुक 
              जाने तक
याद आएगा वो शख्स मुझे मर जाने
                 तक ओर पढ़े
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ये वक्त ये सफर
               ये किस्से
                    सब बेमाने रह जाते है
कितना भी सम्भाले
                  कुछ रिश्ते अनजाने रह जाते है। ओर पढ़े
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किसी की तहज्जुद भी
                        काम नही आती
किसी की कजा भी
              कुबुक हो जाती है ओर पढे
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में जिस दिन किसी ओर के निकाह में 
               बन्ध जाऊँगी
खुदा की कसम तुझे बेतहाशा फिर याद आऊँगीओर अधिक पढे
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लब तो खामोश रहेंगे ये वादा है मेरा तुमसे
अगर कह बैठी कुछ निगाहे तो खफा मत होनाओर अधिक पढे
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एक औरत हर किरदार में बस खूब सूरत होती हैं
खुदा भी दर्द से सिसकता है जब ये नियमत रोती है।ओर अधिक पढे
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तेज बारिश में कभी सर्द हवाओं में रहा
एक तेरा जिक्र था जो मेरी सदाओं में रहा
कितने लोगों से मेरे गहरे रिश्ते थे मगर
तेज चेहरा हि सिर्फ मेरी दुआओं में रहाओर अधिक पढे
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एक सितारा मेरे अंधेरो में
                            उतर आया
       तेरी दुआओं में जब भी
मेरा नाम आया ओर अधिक पढे
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जब भी सोचु क्या चाह रही हु में तो

तुझको मुझमैं ओर मुझे तुझमे पा रही हु में
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मोहब्बत की तलाश मैं क्यू निकले हो जनाब
मोहब्बत खुद तलाश लेती हैं जिसे बर्बाद करना होता हैं...ओर अधिक पढ़े
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आवाज की पहुंच बस कान तक होती हैं
ओर खामोशी की आसमान तक।।
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कुछ अल्फाज हैं जो अधूरे रह गए
हम भी उन बिन कहा पूरे रह गए।।
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इंतजार से थकी इन आँखों में एक ख्याल चाहता हु।
मेरी नज्मो को पढ़ने वाले में तुझसे एक मुलाकात चाहता हूँ।ओर अधिक पढ़े
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मैं नहिं माखन खायो

मैं नहिं माखन खायो मैया! मैं नहिं माखन खायो।
ख्याल परै ये सखा सबै मिलि मेरैं मुख लपटायो॥
देखि तुही छींके पर भाजन ऊंचे धरि लटकायो।
हौं जु कहत नान्हें कर अपने मैं कैसें करि पायो॥

मुख दधि पोंछि बुद्धि इक कीन्हीं दोना पीठि दुरायो।
डारि सांटि मुसुकाइ जशोदा स्यामहिं कंठ लगायो॥

बाल बिनोद मोद मन मोह्यो भक्ति प्राप दिखायो।
सूरदास जसुमति को यह सुख सिव बरंचि नहिं पायो॥

राग रामकली में बद्ध यह सूरदास का अत्यंत प्रचलित पद है। 

श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं में माखन चोरी की लीला सुप्रसिद्ध है। वैसे तो कन्हैया ग्वालिनों के घरों में जा-जाकर माखन चुराकर खाया करते थे। 
लेकिन आज उन्होंने अपने ही घर में माखन चोरी की और यशोदा ने उन्हें देख भी लिया। 

इस पद में सूरदास ने श्रीकृष्ण के वाक्चातुर्य का जिस प्रकार वर्णन किया है वैसा अन्यत्र नहीं मिलता।

जब यशोदा ने देख लिया कि कान्हा ने माखन खाया है तो पूछ ही लिया कि क्यों रे कान्हा ! तूने माखन खाया है क्या ? 

तब श्रीकृष्ण अपना पक्ष किस तरह मैया के समक्ष प्रस्तुत करते हैं, यही इस पद की विशिष्टता है। 

कन्हैया बोले.. मैया! मैंने माखन नहीं खाया है। मुझे तो ऐसा लगता है कि इन ग्वाल-बालों ने ही बलात् मेरे मुख पर माखन लगा दिया है। 

फिर बोले कि मैया तू ही सोच, तूने यह छींका किना ऊंचा लटका रखा है और मेरे हाथ कितने छोटे-छोटे हैं। 

इन छोटे हाथों से मैं कैसे छींके को उतार सकता हूँ। 
कन्हैया ने मुख से लिपटा माखन पोंछा और एक दोना जिसमें माखन बचा रह गया था उसे पीछे छिपा लिया। 

कन्हैया की इस चतुराई को देखकर यशोदा मन ही मन मुस्कराने लगीं और छड़ी फेंककर कन्हैया को गले से लगा लिया। 

सूरदास कहते हैं कि यशोदा को जिस सुख की प्राप्ति हुई वह सुख शिव व ब्रह्मा को भी दुर्लभ है। 
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श्रीकृष्ण (भगवान् विष्णु) ने बाल लीलाओं के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि भक्ति का प्रभाव कितना महत्त्‍‌वपूर्ण है।

 जय जय श्री राधे 👌आगे पढ़िये
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भागवत कथा की शुरुआत

श्रीमद्भागवत कथा (Shrimad Bhagwat)  श्रवण से जन्म जन्मांतर के विकार नष्ट होकर प्राणी मात्र का लौकिक व आध्यात्मिक विकास होता है।  शनि देव की कथा क्लिक कीजिए

जहां अन्य युगों में धर्म लाभ एवं मोक्ष प्राप्ति के लिए कड़े प्रयास करने पड़ते हैं, कलियुग में कथा सुनने मात्र से व्यक्ति भवसागर से पार हो जाता है। 

सोया हुआ ज्ञान वैराग्य कथा श्रवण से जाग्रत हो जाता है। 

कथा कल्पवृक्ष के समान है, जिससे सभी इच्छाओं की पूर्ति की जा सकती है।

महर्षि श्रृंगी अपने पिता ऋषि शमीक के आश्रम में अन्य ऋषिकुमारों के साथ रहकर अध्ययन कर रहे थे। 

एक दिन सब विद्यार्थी जंगल गए हुए थे और आश्रम में शमीक ऋषि समाधि में बैठे थे।👌 असली मानव की पहचान क्लिक कीजिए

तभी प्यास से व्याकुल राजा परीक्षित आश्रम पहुंचे। राजा आश्रम में पानी खोजने लगे। 

समाधि में बैठे शमीक ऋषि को प्रणाम कर विनम्रता से कहा- मुझे प्यास लगी है; पानी दीजिए! 

राजा के दो-तीन बार कहने पर भी ऋषि नहीं उठे, तो राजा को लगा ऋषि, ध्यान का ढोंग कर रहे हैं।

राजा को बड़ा क्रोध आया और पास में एक मरे सांप को उठाकर ऋषि के गले में डाल दिया। 

राजा परीक्षित को आश्रम से जाते हुए एक ऋषि कुमार ने दूर से देखा और जाकर श्रृंगी को खबर दी। 

सभी राजा के स्वागत के लिए आश्रम पहुंचे। 
राजा जा चुके थे और ध्यान में बैठे शमीक ऋषि के गले में मरा सांप पड़ा था। 

इतना देखकर श्रृंगी को क्रोध आ गया और हाथ में पानी लेकर शाप दिया कि.. 

"मेरे ऋषि पिता का अपमान करने वाले राजा परीक्षित की मृत्यु आज से सातवें दिन नागराज तक्षक के काटने से होगी !" 

तभी ऋषिकुमारों ने ऋषि शमीक के गले से सांप निकाला इसी बीच शमीक की समाधि टूट गई। 

शमीक ऋषि ने पूछा, क्या बात है? तब श्रृंगी ने सारी बात बताई।

शमीक बोले, बेटा, राजा परीक्षित के साधारण अपराध के लिए तुमने जो सर्पदंश से मृत्यु का भयंकर शाप दिया है, यह बहुत बुरा है। 

हमें यह शोभा नहीं देता! बेटा श्रृंगी, अभी तुझे ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ। 

अब तू भगवान की शरण जा और अपने अपराध की क्षमा मांग। 

राजा परीक्षित को राजभवन पहुंचते-पहुंचते अपनी गलती का अहसास हो चुका था। 

थोड़ी देर बाद शमीक ऋषि का एक शिष्य राजा परीक्षित के पास पहुंचा और उसने कहा... 

राजन्, ब्रह्मसमाधि में लीन शमीक ऋषि की ओर से आपका यथोचित सत्कार नहीं हुआ। 

इसलिए उन्हें अत्यंत खेद है। किंतु, आपने बिना सोचे-समझे जो मरे सांप को उनके गले में डाल दिया। 

इस कारण उनके पुत्र श्रृंगी ने आपको, आज से सातवें दिन सांप काटने से मृत्यु का शाप दिया है। यह शाप असत्य नहीं होगा।

अतः सात दिन आप अपना समय ईश्वर-चिंतन और मोक्षमार्ग की साधना में बिताएं। 

राजा को संतोष हुआ कि मेरे द्वारा हुए अपराध के लिए मुझे उचित दंड मिलेगा! 

अब राजा परीक्षित व्यासपुत्र शुकदेव मुनि के पास पहुंचे। 

शुकदेवजी ने परीक्षित को सात दिन भागवत-कथा (shrimad bhagwat) सुनाई। 

तभी से, यह पुण्यप्रद भागवत सप्ताह सुनने की परंपरा प्रारंभ हुई

 जय जय श्री राधे क्लिक कीजिए
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शनिदेव की कथा

शनि,  भगवान  सूर्य तथा छाया के पुत्र हैं।  इनकी  दृष्टि में जो क्रूरता है,  वह
इनकी  पत्नी के  शाप के  कारण  है।  ब्रह्मपुराण के  अनुसार,  बचपनसे  ही
शनिदेव भगवान श्रीकृष्ण  के भक्त थे।  बड़े होने पर इनका  विवाह  चित्ररथ
की कन्या से किया गया। इनकी पत्नि  सती-साध्वी और परम तेजस्विनी थीं।
एक  बार  पुत्र-प्राप्ति  की  इच्छा से वे  इनके  पास  पहुचीं पर ये श्रीकृष्ण के
ध्यान में मग्न थे। इन्हें बाह्य जगत की कोई सुधि  ही  नहीं थी। पत्नि  प्रतिक्षा
कर थक गयीं तब  क्रोधित हो उसने इन्हें शाप दे दिया कि आज से तुम जिसे
देखोगे वह नष्ट हो जाएगा। ध्यान टूटने  पर जब शनिदेव ने  उसे मनाया और
समझाया तो पत्नि को अपनीभूल पर पश्चाताप हुआ, किन्तु शाप के प्रतिकार
की शक्ति उसमें ना थी। तभी से शनिदेव अपना सिर नीचा करके रहने लगे।
क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि उनके द्वारा किसीका अनिष्ट हो। 
शनि के अधिदेवता  प्रजापति  ब्रह्मा  और  प्रत्यधिदेवता यम हैं।  इनका वर्ण
इन्द्रनीलमणी  के  समान है। वाहन  गीध तथा  रथ  लोहे का बना हुआ है। ये
अपने  हाथों में  धनुष,  बाण, त्रिशूल  तथा वरमुद्रा  धारण  करते हैं। 
यह  एक-एकराशि में तीस-तीस महीने रहते हैं।  यह मकर व  कुम्भ राशि के स्वामी हैं तथा  इनकी महादशा 19  वर्ष की  होती है। इनका  सामान्य मंत्र  है - "ऊँ शं शनैश्चराय नम:"  इसका श्रद्धानुसार रोज एक निश्चित संख्या में जाप करना क्चाहिए।
शनिवार का व्रत यूं तो आप वर्षके किसी भी शनिवार के दिन शुरू कर सकते
हैं परंतु श्रावण मास में शनिवार का व्रत प्रारम्भ करना अति मंगलकारी है ।
इस व्रत का पालन करने वाले को  शनिवार  के दिन प्रात: ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके शनिदेव की प्रतिमा की विधि सहित पूजन करनी चाहिए। 
शनि भक्तों को इस दिन शनि मंदिर में  जाकर  शनि देव को  नीले  लाजवन्ती
का फूल, तिल, तेल, गुड़ अर्पण करना चाहिए। शनि देव के नाम से दीपोत्सर्ग
करना चाहिए।
शनिवार के दिन  शनिदेव की पूजा के  पश्चात उनसे अपने अपराधों एवं जाने
अनजाने जो  भी आपसे पाप कर्म हुआ  हो  उसके लिए क्षमा याचना  करनी
चाहिए। शनि महाराज की पूजा के पश्चात  राहु और  केतु की पूजा भी करनी
चाहिए। इस दिन शनि भक्तों  को पीपल  में जल देना चाहिए  और पीपल  मे
सूत्र  बांधकर सात   बार  परिक्रमा  करना चाहिए। शनिवार के दिन भक्तों को
शनि महाराज के नाम से व्रत रखना चाहिए।
शनि की अत्यन्त सूक्ष्म  दृष्टि  है । शनि अच्छे  कर्मो के फलदाता भी है। शनि
बुर कर्मो का दंड भी देते है।

 जय श्री शनिदेव
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गर्मी का मौसम चल रहा है

 इस मौसम मे जून और जुलाई का महीना होता है 

जिसमें पक्षियों को दाना पानी के लिए मोहताज होना पङता है । 

बिना दाना पानी के पता नहीं कितने अनगिनत जीव बेमौत मर जाते हैं 
अगर हम सभी उनको बचाने की ठान ले तो एक भी जीव नहीं मरेगा 

और उसके लिए कोई ज्यादा खर्चा या मेहनत का काम नहीं है 

बस आप उनके लिए घर की छतों पर या किसी पेड़ पर परिंडे लगा दें 

और सुबह शाम उसमें पानी भरते रहें दाना डालें तो यह पक्षी बच सकते हैं
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असली मानव की पहचान

एक ब्राह्मण यात्रा करते-करते किसी नगर से गुजरा..

बड़े-बड़े महल एवं अट्टालिकाओं को देखकर ब्राह्मण भिक्षा माँगने गया.. किन्तु किसी ने भी उसे दो मुट्ठी अन्न नहीं दिया.. 

आखिर दोपहर हो गयी.. ब्राह्मण दुःखी होकर अपने भाग्य को कोसता हुआ जा रहा था..

कैसा मेरा दुर्भाग्य है.. इतने बड़े नगर में मुझे खाने के लिए दो मुट्ठी अन्न तक न मिला..!!

रोटी बना कर खाने के लिए दो मुट्ठी आटा तक न मिला ?

इतने में एक सिद्ध संत की निगाह उस पर पड़ी.. उन्होंने ब्राह्मण की बड़बड़ाहट सुन ली.. 

वे बड़े पहुँचे हुए संत थे उन्होंने कहा.. ब्राह्मण  तुम मनुष्य से भिक्षा माँगो, पशु क्या जानें भिक्षा देना ?

ब्राह्मण दंग रह गया और कहने लगा.. हे महात्मन्  आप क्या कह रहे हैं ? बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं में रहने वाले मनुष्यों से ही मैंने भिक्षा माँगी है..

संत.. नहीं ब्राह्मण !! मनुष्य शरीर में दिखने वाले वे लोग भीतर से मनुष्य नहीं हैं.. अभी भी वे पिछले जन्म के हिसाब ही जी रहे हैं.. 

कोई शेर की योनी से आया है.. तो कोई कुत्ते की योनी से आया है, कोई हिरण की योनि से आया है.. तो कोई गाय या भैंस की योनी से आया है 

उन की आकृति मानव-शरीर की जरूर है किन्तु अभी तक उन में मनुष्यत्व निखरा नहीं है.. और जब तक मनुष्यत्व नहीं निखरता, तब तक दूसरे मनुष्य की पीड़ा का पता नहीं चलता. 

‘दूसरे में भी मेरा ही दिलबर ही है’.. यह ज्ञान नहीं होता.. तुम ने मनुष्यों से नहीं, पशुओं से भिक्षा माँगी है..

ब्राह्मण का चेहरा दुःख रहा था.. ब्राह्मण का चेहरा इन्कार की खबरें दे रहा था.. 

सिद्धपुरुष तो दूरदृष्टि के धनी होते हैं उन्होंने कहा.. देख ब्राह्मण मैं तुझे यह चश्मा देता हूँ.. इस चश्मे को पहन कर जा और कोई भी मनुष्य दिखे, उस से भिक्षा माँग फिर देख, क्या होता है..

ब्राह्मण जहाँ पहले गया था, वहीं पुनः गया.. योगसिद्ध कला वाला चश्मा पहनकर गौर से देखा.. ओहोऽऽऽऽ…. वाकई कोई कुत्ता है कोई बिल्ली है.. तो कोई बघेरा है। 

आकृति तो मनुष्य की है लेकिन संस्कार पशुओं के हैं.. मनुष्य होने पर भी मनुष्यत्व के संस्कार नहीं हैं.. 

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घूमते-घूमते वह ब्राह्मण थोड़ा सा आगे गया तो देखा कि एक मोची जूते सिल रहा है.. ब्राह्मण ने उसे गौर से देखा तो.. उस में मनुष्यत्व का निखार पाया..

ब्राह्मण ने उस के पास जाकर कहा.. भाई तेरा धंधा तो बहुत हल्का है.. और मैं हूँ कि ब्राह्मण रीति रिवाज एवं कर्मकाण्ड को बड़ी चुस्ती से पालता हूँ.. 

मुझे बड़ी भूख लगी है.. लेकिन तेरे हाथ का नहीं खाऊँगा.. फिर भी मैं तुझसे माँगता हूँ.. क्योंकि मुझे तुझमें मनुष्यत्व दिखा है..

उस मोची की आँखों से टप-टप आँसू बरसने लगे.. वह बोला.. हे प्रभु आप भूखे हैं ? हे मेरे रब आप भूखे हैं !! इतनी देर आप कहाँ थे ?

यह कहकर मोची उठा.. एवं जूते सिलकर टका, आना-दो आना वगैरह जो इकट्ठे किये थे.. उस चिल्लर ( रेज़गारी ) को लेकर हलवाई की दुकान पर पहुँचा.. और बोला.. 

हे हलवाई मेरे इन भूखे भगवान की सेवा कर लो.. ये चिल्लर यहाँ रखता हूँ.. जो कुछ भी सब्जी-पराँठे-पूरी आदि दे सकते हो.. वह इन्हें दे दो मैं अभी जाता हूँ..

यह कहकर मोची भागा.. घर जाकर अपने हाथ से बनाई हुई एक जोड़ी जूती ले आया.. एवं चौराहे पर उसे बेचने के लिए खड़ा हो गया..

उस राज्य का राजा जूतियों का बड़ा शौकीन था.. उस दिन भी उस ने कई तरह की जूतियाँ पहनीं.. किंतु किसी की बनावट उसे पसंद नहीं आयी तो किसी का नाप नहीं आया.. 

दो-पाँच बार प्रयत्न करने पर भी राजा को कोई पसंद नहीं आयी तो मंत्री से क्रुद्ध होकर बोला.. अगर इस बार ढंग की जूती लाया तो जूती वाले को इनाम दूँगा.. और ठीक नहीं लाया तो मंत्री के बच्चे तेरी खबर ले लूँगा..

दैव योग से मंत्री की नज़र इस मोची के रूप में खड़े असली मानव पर पड़ गयी.. जिस में मानवता खिली थी, जिस की आँखों में कुछ प्रेम के भाव थे, चित्त में दया-करूणा थी,  

ब्राह्मण के संग का थोड़ा रंग लगा था.. मंत्री ने मोची से जूती ले ली एवं राजा के पास ले गया.. 

राजा को वह जूती एकदम ‘फिट’ आ गयी.. मानो वह जूती राजा के नाप की ही बनी थी.. 

राजा ने कहा.. ऐसी जूती तो मैं पहली बार ही पहन रहा हूँ.. किस मोची ने बनाई है यह जूती ?

मंत्री बोला..  हुजूर  यह मोची बाहर ही खड़ा है..

मोची को बुलाया गया.. उस को देखकर राजा की भी मानवता थोड़ी खिली.. 

राजा ने कहा.. जूती के तो पाँच रूपये होते हैं किन्तु यह पाँच रूपयों वाली नहीं.. पाँच सौ रूपयों वाली जूती है.. जूती बनाने वाले को पाँच सौ और जूती के पाँच सौ.. कुल एक हजार रूपये इसको दे दो..

मोची बोला.. राजा साहिब तनिक ठहरिये यह जूती मेरी नहीं है, जिसकी है उसे मैं अभी ले आता हूँ”

मोची जाकर विनयपूर्वक ब्राह्मण को राजा के पास ले आया एवं राजा से बोला.. राजा साहब यह जूती इन्हीं की है..

राजा को आश्चर्य हुआ वह बोला.. यह तो ब्राह्मण है.. इस की जूती कैसे ?

राजा ने ब्राह्मण से पूछा.. ब्राह्मण ने कहा.. मैं तो ब्राह्मण हूँ यात्रा करने निकला हूँ..

राजा.. मोची.. जूती तो तुम बेच रहे थे इस ब्राह्मण ने जूती कब खरीदी और बेची ?

मोची ने कहा.. राजन् मैंने मन में ही संकल्प कर लिया था कि जूती की जो रकम आयेगी वह इन ब्राह्मणदेव की होगी.. 

जब रकम इन की है तो मैं इन रूपयों को कैसे ले सकता हूँ ? 

इसीलिए मैं इन्हें ले आया हूँ.. न जाने किसी जन्म में मैंने दान करने का संकल्प किया होगा और मुकर गया होऊँगा.. तभी तो यह मोची का चोला मिला है.. 

अब भी यदि मुकर जाऊँ तो.. तो न जाने मेरी कैसी दुर्गति हो ? 

इसीलिए राजन् ये रूपये मेरे नहीं हुए.. मेरे मन में आ गया था कि इस जूती की रकम इनके लिए होगी.. फिर पाँच रूपये मिलते तो भी इनके होते.. और एक हजार मिल रहे हैं.. तो भी इनके ही हैं..

हो सकता है मेरा मन बेईमान हो जाता.. इसीलिए मैंने रूपयों को नहीं छुआ और असली अधिकारी को ले आया..

राजा ने आश्चर्य चकित होकर ब्राह्मण से पूछा.. ब्राह्मण मोची से तुम्हारा परिचय कैसे हुआ ?

ब्राह्मण ने सारी आप बीती सुनाते हुए सिद्ध पुरुष के चश्मे वाली बात बताई.. 

आप के राज्य में पशुओं के दीदार तो बहुत हुए.. लेकिन मनुष्यत्व का विकास इस मोची में ही नज़र आया..

राजा ने कौतूहलवश कहा.. लाओ, वह चश्मा जरा हम भी देखें..

राजा ने चश्मा लगाकर देखा.. तो दरबारी वगैरह में उसे भी कोई सियार दिखा तो कोई हिरण, कोई बंदर दिखा तो कोई रीछ.. 

राजा दंग रह गया कि यह तो पशुओं का दरबार भरा पड़ा है.. उसे हुआ कि ये सब पशु हैं तो मैं कौन हूँ ? 

उस ने आईना मँगवाया एवं उसमें अपना चेहरा देखा.. तो शेर.. उस के आश्चर्य की सीमा न रही...

ये सारे जंगल के प्राणी और मैं जंगल का राजा शेर.. यहाँ भी इनका राजा बना बैठा हूँ.. 

राजा ने कहा.. ब्राह्मणदेव योगी महाराज का यह चश्मा तो बड़ा गज़ब का है.. वे योगी महाराज कहाँ होंगे ?

ब्राह्मण.. वे तो कहीं चले गये.. ऐसे महापुरुष कभी-कभी ही और बड़ी कठिनाई से मिलते हैं..

श्रद्धावान ही ऐसे महापुरुषों से लाभ उठा पाते हैं.. बाकी तो जो मनुष्य के चोले में पशु के समान हैं.. वे महापुरुष के निकट रहकर भी अपनी पशुता नहीं छोड़ पाते..

ब्राह्मण ने आगे कहा.. राजन् अब तो बिना चश्मे के भी मनुष्यत्व को परखा जा सकता है.. 

व्यक्ति के व्यवहार को देखकर ही पता चल सकता है कि वह किस योनि से आया है.. 

यह भी पढ़ें *शिवाजी का अनूठा साहस*

एक मेहनत करे और दूसरा उस पर हक जताये तो समझ लो कि वह सर्प योनि से आया है.. 

क्योंकि बिल खोदने की मेहनत तो चूहा करता है लेकिन सर्प उस को मारकर.. बिल पर अपना अधिकार जमा बैठता है..

अब इस चश्मे के बिना भी विवेक का चश्मा काम कर सकता है.. और दूसरे को देखें.. उसकी अपेक्षा स्वयं को ही देखें कि हम सर्पयोनि से आये हैं.. कि शेर की योनि से आये हैं.. 

या सचमुच में हम में मनुष्यता खिली है ? यदि पशुता बाकी है तो वह भी मनुष्यता में बदल सकती है कैसे ?

तुलसीदाज जी ने कहा हैः

बिगड़ी जनम अनेक की 
          सुधरे अब और आजु
तुलसी होई राम को 
          रामभजि तजि कुसमाजु

कुसंस्कारों को छोड़ दें… बस अपने कुसंस्कार आप निकालेंगे तो ही निकलेंगे.. 

अपने भीतर छिपे हुए पशुत्व को आप निकालेंगे तो ही निकलेंगे.. यह भी तब संभव होगा जब आप अपने समय की कीमत समझेंगे.. 

मनुष्यत्व आये तो एक-एक पल को सार्थक किये बिना आप चुप नहीं बैठेंगे.. 

पशु अपना समय ऐसे ही गँवाता है.. पशुत्व के संस्कार पड़े रहेंगे तो आपका समय बिगड़ेगा... अतः पशुत्व के संस्कारों को आप निकालिये एवं मनुष्यत्व के संस्कारों को उभारिये.. 

फिर सिद्धपुरुष का चश्मा नहीं, वरन् अपने विवेक का चश्मा ही कार्य करेगा और इस विवेक के चश्मे को पाने की युक्ति मिलती है सत्संग से..

मानवता से जो पूर्ण हो, वही मनुष्य कहलाता है। बिन मानवता के मानव भी, पशुतुल्य रह जाता है।
साभार :- ज्ञान

 ((((((( जय जय श्री राधे )))))))

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(((( सबसे बड़ा धन ))))

एक बार एक शक्तिशाली राजा घने वन में शिकार खेल रहा था। 
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अचानक आकाश में बादल छा गए और मूसलाधार वर्षा होने लगी। 
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सूर्य अस्त हो गया और धीरे-धीरे अँधेरा छाने लगा। अँधेरे में राजा अपने महल का रास्ता भूल गया और सिपाहियों से अलग हो गया। 
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भूख प्यास और थकावट से व्याकुल राजा जंगल के किनारे एक टीले पर बैठ गया। 
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थोड़ी देर बाद उसने वहाँ तीन बालकों को देखा।
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तीनों बालक अच्छे मित्र थे। वे गाँव की ओर जा रहे थे। 
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सुनो बच्चों ! ‘जरा यहाँ आओ।’ राजा ने उन्हें बुलाया। 
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बालक जब वहाँ पहुंचे तो राजा ने उनसे पूछा – ‘क्या कहीं से थोड़ा भोजन और जल मिलेगा ?’ मैं बहुत प्यासा हूँ और भूख भी बहुत लगी है।
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बालकों ने उत्तर दिया – ‘अवश्य ‘। हम घर जा कर अभी कुछ ले आते है। वे गाँव की ओर भागे और तुरंत जल और भोजन ले आये। 
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राजा बच्चों के उत्साह और प्रेम को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ।
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राजा बोला – “प्यारे बच्चों ! तुम लोग जीवन में क्या करना चाहते हो ? मैं तुम सब की सहायता करना चाहता हूँ।”
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कुछ देर सोचने के बाद एक बालक बोला – ‘ मुझे धन चाहिए। मैंने कभी दो समय की रोटी नहीं खायी है। 
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कभी सुन्दर वस्त्र नहीं पहने है इसलिए मुझे केवल धन चाहिए। 
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राजा मुस्कुरा कर बोले – ठीक है। मैं तुम्हें इतना धन दूँगा कि जीवन भर सुखी रहोगे। यह शब्द सुनते ही बालकों की ख़ुशी का ठिकाना न रहा।
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दूसरे बालक ने बड़े उत्साह से पूछा – “क्या आप मुझे एक बड़ा-सा बँगला और घोड़ागाड़ी देंगे ?’ 
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राजा ने कहा – अगर तुम्हे यही चाहिए तो तुम्हारी इच्छा भी पूरी हो जाएगी।
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तीसरे बालक ने कहा – “मुझे न धन चाहिए न ही बंगला-गाड़ी। मुझे तो आप ऐसा आशीर्वाद दीजिए जिससे मैं पढ़-लिखकर विद्वान बन सकूँ..
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और शिक्षा समाप्त होने पर मैं अपने देश की सेवा कर सकूँ। 
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तीसरे बालक की इच्छा सुनकर राजा बहुत प्रभावित हुआ। उसने उसके लिए उत्तम शिक्षा का प्रबंध किया। 
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वह परिश्रमी बालक था इसलिए दिन-रात एक करके उसने पढाई की और बहुत बड़ा विद्वान बन गया और समय आने पर राजा ने उसे अपने राज्य में मंत्री पद पर नियुक्त कर लिया।
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एक दिन अचानक राजा को वर्षों पहले घटी उस घटना की याद आई। 
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उन्होंने मंत्री से कहा, वर्षों पहले तुम्हारे साथ जो दो और बालक थे, अब उनका क्या हाल-चाल है… 
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मैं चाहता हूँ की एक बार फिर मैं एक साथ तुम तीनो से मिलूं, अतः कल अपने उन दोनों मित्रों को भोजन पर आमंत्रित कर लो।
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मंत्री ने दोनों को संदेशा भिजवा दिया और अगले दिन सभी एक साथ राजा के सामने उपस्थित हो गए।
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‘आज तुम तीनो को एक बार फिर साथ देखकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ। इनके बारे में तो मैं जानता हूँ…
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पर तुम दोनों अपने बारे में बताओ। “, राजा ने मंत्री के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।
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जिस बालक ने धन माँगा था वह दुखी होते हुए बोला, “राजा साहब, मैंने उस दिन आपसे धन मांग कर बड़ी गलती की। 
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इतना सारा धन पाकर मैं आलसी बन गया और बहुत सारा धन बेकार की चीजों में खर्च कर दिया, मेरा बहुत सा धन चोरी भी हो गया ….
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और कुछ एक वर्षों में ही मैं वापस उसी स्थिति में पहुँच गया जिसमे आपने मुझे देखा था।”
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बंगला-गाडी मांगने वाले बालक भी अपना रोना रोने लगा, ” महाराज, मैं बड़े ठाट से अपने बंगले में रह रहा था..
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पर वर्षों पहले आई बाढ़ में मेरा सबकुछ बर्वाद हो गया और मैं भी अपने पहले जैसी स्थिति में पहुँच गया।
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उनकी बातें सुनने के बाद राजा बोले, ”इस बात को अच्छी तरह गाँठ बाँध लो धन-संपदा सदा हमारे पास नहीं रहते पर ज्ञान जीवन-भर मनुष्य के काम आता है और उसे कोई चुरा भी नहीं सकता। 
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शिक्षा ही मानव को विद्वान और बड़ा आदमी बनाती है, इसलिए सबसे बड़ा धन “विद्या” ही है।”
साभार :- अछि खबर

 ((((((( जय जय श्री राधे )))))))
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यह भी नहीं रहने वाला 

एक साधु देश में यात्रा के लिए पैदल निकला हुआ था। एक बार रात हो जाने पर वह एक गाँव में आनंद नाम के व्यक्ति के दरवाजे पर रुका। आनंद ने साधू  की खूब सेवा की। दूसरे दिन आनंद ने बहुत सारे उपहार देकर साधू को विदा किया।

साधू ने आनंद के लिए प्रार्थना की  - "भगवान करे तू दिनों दिन बढ़ता ही रहे।" साधू की बात सुनकर आनंद हँस पड़ा और बोला - "अरे, महात्मा जी! जो है यह भी नहीं रहने वाला।" साधू आनंद  की ओर देखता रह गया और वहाँ से चला गया।

दो वर्ष बाद साधू फिर आनंद के घर गया और देखा कि सारा वैभव समाप्त हो गया है। पता चला कि आनंद अब बगल के गाँव में एक जमींदार के यहाँ नौकरी करता है। साधू आनंद से मिलने गया।

आनंद ने अभाव में भी साधू का स्वागत किया। *झोंपड़ी में फटी चटाई पर बिठाया। खाने के लिए सूखी रोटी दी। दूसरे दिन जाते समय साधू की आँखों में आँसू थे।* साधू कहने लगा - "हे भगवान् ! ये तूने क्या किया?"

आनंद पुन: हँस पड़ा और बोला - *"महाराज  आप क्यों दु:खी हो रहे है? महापुरुषों ने कहा है कि भगवान्  इन्सान को जिस हाल में रखे, इन्सान को उसका धन्यवाद करके खुश रहना चाहिए।* समय सदा बदलता रहता है और सुनो! यह भी नहीं रहने वाला।"

साधू मन ही मन सोचने लगा - "मैं तो केवल भेष से साधू हूँ। सच्चा साधू तो तू ही है, आनंद।" *कुछ वर्ष बाद साधू फिर यात्रा पर निकला और आनंद से मिला तो देखकर हैरान रह गया कि आनंद  तो अब जमींदारों का जमींदार बन गया है।* मालूम हुआ कि जिस जमींदार के यहाँ आनंद  नौकरी करता था वह सन्तान विहीन था, मरते समय अपनी सारी जायदाद आनंद को दे गया। 

साधू ने आनंद  से कहा - *"अच्छा हुआ, वो जमाना गुजर गया। भगवान्  करे अब तू ऐसा ही बना रहे।"* यह सुनकर आनंद  फिर हँस पड़ा और कहने लगा - "महाराज! अभी भी आपकी नादानी बनी हुई है।"

साधू ने पूछा - "क्या यह भी नहीं रहने वाला?"
*आनंद ने उत्तर दिया* - "हाँ! 
या तो यह चला जाएगा या फिर इसको अपना मानने वाला ही चला जाएगा। कुछ भी रहने वाला नहीं  है और अगर *शाश्वत कुछ है तो वह है परमात्मा और उस परमात्मा की अंश आत्मा।"*

आनंद  की बात को साधू ने गौर से सुना और चला गया।

*साधू कई साल बाद फिर लौटता है तो देखता है कि आनंद  का महल तो है किन्तू कबूतर उसमें गुटरगूं कर रहे हैं, और आनंद  का देहांत हो गया है। बेटियाँ अपने-अपने घर चली गयीं, बूढ़ी पत्नी कोने में पड़ी है।*

साधू कहता है - *"अरे इन्सान! तू किस बात का अभिमान करता है? क्यों इतराता है? यहाँ कुछ भी टिकने वाला नहीं है, दु:ख या सुख कुछ भी सदा नहीं रहता।* तू सोचता है पड़ोसी मुसीबत में है और मैं मौज में हूँ। लेकिन सुन, न मौज रहेगी और न ही मुसीबत। सदा तो उसको जानने वाला ही रहेगा। सच्चे इन्सान वे हैं, जो हर हाल में खुश रहते हैं। *मिल गया माल तो उस माल में खुश रहते हैं, और हो गये बेहाल तो उस हाल में खुश रहते हैं।"*

साधू कहने लगा - *"धन्य है आनंद! तेरा सत्संग, और धन्य हैं तुम्हारे सतगुरु! मैं तो केवल साधू हूँ, असली फकीरी तो तेरी जिन्दगी है।* अब मैं तेरी तस्वीर देखना चाहता हूँ, कुछ फूल चढ़ाकर दुआ तो मांग लूं।"

*साधू दूसरे कमरे में जाता है तो देखता है कि आनंद  ने अपनी तस्वीर  पर लिखवा रखा है - 

आखिर में यह भी  नहीं रहेगा।
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ज़िंदगी भर इनके पीछे भागते हैं हम

एक जंगल में एक लोमड़ी रहती थी। अमूमन वह सुबह जल्दी जाग जाती थी, लेकिन उस दिन थोड़ा देर से जागी। लोमड़ी जैसे ही अपने घर से बाहर आई तो उसकी पूंछ सूरज की ओर थी। छाया सामने पड़ रही थी। छाया देखकर लोमड़ी को पहली बार अपने शरीर का स्वरूप पता चला।

छाया में उसका रूप बहुत बड़ा दिखाई दे रहा था। तब लोमड़ी ने सोचा, क्यों ने किसी बड़े जीव का शिकार किया जाए। बस ! यही भ्रम में वह इतनी उतावली हो गई कि घने जंगल में बड़े शिकार की चाह लिए पहुंच गई।

सूरज अब तक सिर पर चढ़ आया था। लोमड़ी को भूख भी बहुत लग रही थी। उसने सोचा क्यों ना आज हाथी का शिकार किया जाए। भूखी लोमड़ी हाथी की तलाश में इधर-उधर भटकने लगी। वह थक गई और एक जगह आराम करने लगी। लेकिन आसमान में सूर्य की दिशा बदल चुकी थी।

लोमड़ी को उसकी छाया छोटी दिखाई दे रही थी। लोमड़ी ने सोचा कि मेरा आकार तो इतना छोटा है क्यों न अब मैं छोटे जीव का शिकार करूं, मेरे लिए तो एक मेंढ़क ही काफी है। मैं बेकार में छाया के भ्रम के चलते इधर-उधर भटक रही थी। उस जब इस बात का ज्ञान हुआ तो उसने अपने एक छोटा शिकार किया और भोजन के बाद एक गहरी नींद में किसी पेड़ के नीचे सो गई।"
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अख़बार बेचने वाला 10 वर्षीय बालक एक मकान का गेट बजा रहा है।
मालकिन - बाहर आकर पूछी क्या है ?
बालक - आंटी जी क्या मैं आपका गार्डेन साफ कर दूं ?
मालकिन - नहीं, हमें नहीं करवाना है, और आज अखबार नही लाया ।
बालक - हाथ जोड़ते हुए दयनीय स्वर में.. "प्लीज आंटी जी करा लीजिये न, अच्छे से साफ करूंगा,आज अखबार नही छपा,कल छुट्टी थी दशहरे की ।"
मालकिन - द्रवित होते हुए "अच्छा ठीक है, कितने पैसा लेगा ?"
बालक - पैसा नहीं आंटी जी, खाना दे देना।"
मालकिन- ओह !! आ जाओ अच्छे से काम करना ।
(लगता है बेचारा भूखा है पहले खाना दे देती हूँ..मालकिन बुदबुदायी।)

मालकिन- ऐ लड़के..पहले खाना खा ले, फिर काम करना ।
बालक -नहीं आंटी जी, पहले काम कर लूँ फिर आप खाना दे देना।
मालकिन - ठीक है, कहकर अपने काम में लग गयी।
बालक - एक घंटे बाद "आंटी जी देख लीजिए, सफाई अच्छे से हुई कि नहीं।
मालकिन -अरे वाह! तूने तो बहुत बढ़िया सफाई की है, गमले भी करीने से जमा दिए। यहां बैठ, मैं खाना लाती हूँ।
जैसे ही मालकिन ने उसे खाना दिया, बालक जेब से पन्नी निकाल कर उसमें खाना रखने लगा।
मालकिन - भूखे काम किया है, अब खाना तो यहीं बैठकर खा ले। जरूरत होगी तो और दे दूंगी।
बालक - नहीं आंटी, मेरी बीमार माँ घर पर है,सरकारी अस्पताल से दवा तो मिल गयी है,पर डाॅ साहब ने कहा है दवा खाली पेट नहीं खाना है।
मालकिन की पलके गीली हो गई..और अपने हाथों से मासूम को उसकी दूसरी माँ बनकर खाना खिलाया फिर उसकी माँ के लिए रोटियां बनाई और साथ उसके घर जाकर उसकी माँ को रोटियां दे आयी । और आते आते कह कर आयी "बहन आप बहुत अमीर हो जो दौलत आपने अपने बेटे को दी है वो हम अपने बच्चों को नहीं दे पाते हैं" । 
माँ बेटे की तरफ डबडबाई आंखों से देखे जा रही थी...बेटा बीमार मां से लिपट गया...
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शिवाजी का अनूठा साहस

पुणे के नजदीक नचनी गाँव में एक आदमखोर चीते का आतंक छाया हुआ था. वह अचानक गाँव में हमला करके जंगल में जाकर ओझल हो जाता था. डरे हुए गाँव वाले अपनी इस समस्या लेकर शिवाजी के पास पहुँचे.

और उन्होंने अपनी व्यथा सुनाई, “हमें उस खतरनाक चीते से बचाइये. वह ना जाने कितने बच्चों को मार चुका है, ज्यादातर वह हम सब सो रहे होते हैं, तब हमला करता है.”

शिवाजी ने धैर्यपूर्वक ग्रामीणों को सुना और आश्वस्त किया, ”आप लोग चिंता मत करिये, मैं यहाँ आपकी मदद करने के लिए ही हूँ .”

शिवाजी अपने साथ यसजी और कुछ सैनिकों लेकर जंगल में चीते को मारने के लिए निकल पड़े . बहुत ढूँढने के बाद जैसे ही वह सामने आया, सैनिक डर कर पीछे हट गये, पर शिवाजी और यसजी बिना डरे उस पर टूट पड़े और पलक झपकते ही उसे मार गिराया. गाँव वाले खुश हो गये और शिवाजी की जयजयकार करने लगे.
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किसान और उसके चार बेटे

एक बार एक गरीब किसान था। उसके चार बेटे थे, लेकिन चारों निकम्मे और कामचोर थे। किसान उनकी इस आदत से बहुत चिंतित रहता था।

किसान के पास बस एक बंजर जमीन का टुकड़ा था। बड़ी मशक्कत से वो दूसरे किसानो के खेत में मेहनत करके रोजी का इंतजाम करता था।

एक बार किसान बहुत बीमार हो गया उसने मरने से पहले अपने बेटों से कहा कि मैंने अपनी जमीन में कुछ सोने की अशर्फियाँ गाड़ रखी हैं, मेरे मरने के बाद तुम उसे निकाल कर आपस में बाँट लेना।

पिता के मरने के बाद गड़ा धन निकालने के लिए चारों भाईयो ने बंजर जमीन को खोदना शुरू कर दिया। काफी खोदने के बाद भी जब कुछ ना निकला तो चारों पिता को कोसते घर की ओर बढ़ने लगे।

गाँव का मुखिया यह सब देख रहा था। चारों को वापिस जाता देख,

मुखिया ने कहा- जब खोद ही दिया है तो बीज भी डाल दो, तुम्हारी इतनी मेहनत का कुछ तो परिणाम मिले! उन चारों ने बेमन से खोदी हुई जमीन में गेहूँ के बीज डाल दिये।

कुछ ही दिनों में वहां गेहूँ की फसल लह लहाने लगी। फसल को बेचकर चारों को अच्छा खासा धन प्राप्त हो गया। फसल से धन पाकर चारों के चेहरे खिल उठे।

भाईयों को खुश देखकर मुखिया उनके पास आया और बोला- “बेटा तुम चारों ने कठिन परिश्रम किया, और उसी का परिणाम है कि आज इस बंजर जमीन को तुम चारों ने उपजाऊ बना दिया।

मुखिया ने फिर कहा- तुम्हारे पिताजी तुम चारों को यही बात समझाना चाहते थे कि मेहनत करने से कठिन से कठिन कार्य में सफलता हासिल की जा सकती है।

इसीलिए उन्होने जमीन में धन गड़ा होने की बात तुम लोगों से कही। वास्तव में असली धन यह तुम्हारा परिश्रम है जिससे तुम जीवन में सफलता का मार्ग प्रशस्त कर सकते हो”।

शिक्षा/Moral:- इस शिक्षाप्रद कहानी से यही पता चलता है कि सफलता पाने का एकमात्र मार्ग है मेहनत । हो सकता है कि तुम पहले प्रयास में कामयाब ना भी हो लेकिन कभी प्रयास करना कभी मत छोड़े. कुछ लोगों को थोड़े प्रयास से सफलता मिल जातो है और कुछ ;लोगों को थोड़ी ज्यादा मेहनत करने से लेकिन अगर प्रयास पूरे दिल से किया जाए तो देर सबेर सफलता मिलता तो निश्चित है|
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एक आदमी की पत्नी अचानक बहुत बीमार पड़ गयी . मरने से पहले उसने अपने पति से कहा , “ मैं तुम्हे बहुत प्यार करती हूँ …. तुम्हे छोड़ कर नहीं जाना चाहती… मैं नहीं चाहती की मेरे जाने के बाद तुम मुझे भुला दो और किसी दूसरी औरत से शादी करो … वादा करो कि मेरे मरने के बाद तुम किसी और से प्रेम नहीं करोगे …वर्ना मेरी आत्मा तुम्हे चैन से जीने नहीं देगी ”

और इतना कह कर वो चल बसी .

उसके जाने के कुछ महीनो तक उस आदमी ने किसी दूसरी औरत की तरफ देखा तक नहीं पर एक दिन उसकी मुलाक़ात एक ऐसी लड़की से हुई जिसे वह चाहने लगा . बात बढ़ते -बढ़ते शादी तक आ गयी और उनकी शादी हो गयी .

शादी के ठीक बाद आदमी को लगा कि कोई उससे कुछ कह रहा है , मुड़ कर देखा तो वो उसकी पहली पत्नी की आत्मा थी.

आत्मा बोली , “ तुमने अपना वादा तोड़ा है , अब मैं हर रोज तुम्हे परेशान करने आउंगी .”

और इतना कह कर वो गायब हो गयी .

आदमी घबरा गया , उसे रात भर नींद नहीं आई .

अगले दिन भी रात को उसे वही आवाज़ सुनाई दी .

“मैं तुम्हे चैन से नहीं जीने दूंगी…. मैं जानती हूँ कि आज तुमने अपनी नयी पत्नी से क्या-क्या बातें की ,..” और उसने आदमी को अक्षरश: एक -एक बात बता दी .

आदमी डर कर कांपने लगा . अगले दिन वह शहर से बहुत दूर एक जेन मास्टर के पास गया और सारी बात बता दी .

मास्टर बोले , “ ये प्रेत बहुत चालाक है ! ”

“बिलकुल है , तभी तो मेरी एक-एक बात उसे पता होती है …”, “ आदमी घबराते हुए बोला .

मास्टर बोले , “ कोई बात नहीं मेरे पास इसका भी इलाज़ है . इस बार जब तुम्हारी पत्नी का भूत आये तो मैं जैसा कहता हूँ तुम ठीक वैसा ही करना .”

उस रात जब आत्मा वापस आई तो आदमी बोला , “ तुम इतनी चालाक हो …मैं तुमसे कुछ भी नहीं छिपा सकता . और जैसा कि तुम चाहती हो मैं अपनी पत्नी को छोड़ने के लिए भी तैयार हूँ पर उसके लिए तुम्हे एक प्रश्न का उत्तर देना होगा …और अगर तुम उत्तर न दे पायी तो तुम्हे हमेशा -हमेशा के लिए मेरा पीछा छोड़ना होगा …”

पत्नी का भूत बोला ,” मंजूर है …पूछो अपना प्रश्न ”

आदमी ने फ़ौरन ज़मीन पर पड़े बहुत सारे छोटे -छोटे कंकड़ अपनी मुट्ठी में भर लिए और बोला , “बताओ मेरी मुट्ठी में कितने कंकड़ हैं ?”

और ठीक उसी समय भूत गायब हो गया .

कुछ हफ़्तों बाद वो एक बार फिर से जेन मास्टर के पास उनका शुक्रिया अदा करने पहुंचा .

“मास्टर , उस भूत से मेरा पीछा छुड़ाने के लिए मैं जीवन भर आपका आभारी रहूँगा .”, आदमी बोला , “ पर मैं ये नहीं समझ पाया की आखिर उस प्रश्न में ऐसा क्या था कि एक झटके में ही भूत गायब हो गया ?”

मास्टर बोले , “ बेटा , दरअसल कोई भूत था ही नहीं ! ”

“मतलब !”, आदमी आश्चर्य से बोला .

“ हाँ , कोई भूत था ही नही , दरअसल दूसरी शादी करने की वजह से तुम्हे एक अपराधबोध महसूस हो रहा था और उसी वजह से तुम्हारा दिमाग एक भ्रम की स्थिति पैदा कर तुम्हे भूत का अनुभव करा रहा था .”, मास्टर ने समझाया .

“ पर ऐसा था तो वो मेरी हर एक बात कैसे जान जाता था ?”, आदमी ने पुछा .

मास्टर मुस्कुराये , “ क्योंकि वो तुम्हारा बनाया हुआ ही भूत था ,इसलिए जो कुछ तुम जानते थे वही वो भी जानता था . और यही कारण था कि मैंने तुम्हे वो कंकड़ वाला प्रश्न पूछने को कहा , क्योंकि मैं जानता था कि इसका उत्तर तुम्हे भी नहीं पता होगा और इसलिए भूत भी इसका उत्तर नहीं दे पायेगा और तुम्हे तुम्हारे दिमाग की ही उपज से छुटकारा मिल जायेगा. ”

आदमी अब पूरी बात समझ चुका था . उसने एक बार फिर मास्टर को धन्यवाद किया और अपने घर लौट गया .

Friends , कई बार हमारे मन में भी किसी पुरानी बात को लेकर एक guilt feeling रह जाती है. कहानी में भूत का आना उसी तरह की फीलिंग का एक extreme form है। पर अधिकतर मामलों में हम किसी पुरानी घटना को याद कर अफ़सोस करते हैं और कभी-कभार खुद पर क्रोधित भी हो जाते हैं। ऐसा बार-बार करना गलत है , अपने भूत की वजह से अपने भविष्य और वर्तमान को बिगाड़ने में कोई समझदारी नहीं है। इसलिए अगर आप भी किसी पुरानी घटना की वजह से अपराधबोध महसूस करते हैं तो ऐसा ना करें , गलतियां करना मनुष्य का स्वाभाव है , सभी करते हैं , आपसे भी हुई तो कोई बात नहीं….उस घटना को पीछे छोड़ें और अपने जीवन को सार्थक बनाने की दिशा में काम करें।
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जो बीत गई सो बीत गई

एक कालेज का छात्र था जिसका नाम था कमल। हमेशा वह बहुत चुपचाप सा रहता था। किसी से ज्यादा बात नहीं करता था इसलिए उसका कोई दोस्त भी नहीं था। वह हमेशा कुछ परेशान सा रहता था। पर लोग उस पर ज्यादा ध्यान नहीं देते थे।

एक दिन वह क्लास में पढ़ रहा था। उसे गुमसुम बैठे देख कर अध्यापक महोदय उसके पास आये और क्लास के बाद मिलने को कहा।

क्लास खत्म होते ही कमल अध्यापक महोदय के कमरे में पहुंचा।

कमल मैं देखता हूँ कि तुम अक्सर बड़े गुमसुम और शांत बैठे रहते हो, ना किसी से बात करते हो और ना ही किसी चीज में रूचि दिखाते हो, इसलिए इसका सीधा असर तुम्हारी पढ़ाई में भी साफ नजर आ रहा है! इसका क्या कारण है ?” अध्यापक महोदय ने पूछा।

कमल बोला, मेरा भूतकाल का जीवन बहुत ही खराब रहा है, मेरी जिन्दगी में कुछ बड़ी ही दुखदायी घटनाएं हुई हैं, मैं उन्ही के बारे में सोच कर परेशान रहता हूँ, और किसी चीज में ध्यान केंद्रित नहीं कर पाता हु।

अध्यापक महोदय  ने ध्यान से कमल की बातें सुनी और मन ही मन उसे फिर से सही रास्ते पर लाने का विचार करके रविवार को घर पे बुलाया।

कमल निश्चित समय पर अध्यापक महोदय के घर पहुँच गया।

कमल क्या तुम नीम्बू शरबत पीना पसंद करोगे? अध्यापक ने पुछा।

जी।  कमल ने झिझकते हुए कहा।

अध्यापक महोदय ने नीम्बू शरबत बनाते वक्त जानबूझ कर नमक अधिक डाल दिया और चीनी की मात्रा  कम ही रखी।

शरबत का एक घूँट पीते ही कमल ने अजीब सा मुंह बना लिया।

अध्यापक महोदय ने पुछा,  क्या हुआ, तुम्हे ये पसंद नहीं आया क्या?

जी, वो इसमे नमक थोड़ा अधिक पड़ गया है…. कमल अपनी बात कह ही रहा था की अध्यापक महोदय ने उसे बीच में ही रोकते हुए कहा, ओफ़-ओ, कोई बात नहीं मैं इसे फेंक देता हूँ, अब ये किसी काम का नहीं रहा…

ऐसा कह कर अध्यापक महोदय गिलास उठा ही रहे थे कि कमल ने उन्हें रोकते हुए कहा, नमक थोड़ा सा अधिक हो गया है तो क्या, हम इसमें थोड़ी और चीनी मिला दें तो ये बिलकुल ठीक हो जाएगा।

बिलकुल ठीक कमल यही तो मैं तुमसे सुनना चाहता था….अब इस स्थिति की तुम अपनी जिन्दगी से तुलना करो, शरबत में नमक का ज्यादा होना जिन्दगी में हमारे साथ हुए बुरे अनुभव की तरह है…. और अब इस बात को समझो, शरबत का स्वाद ठीक करने के लिए हम उसमे में से नमक नहीं निकाल सकते, इसी तरह हम अपने साथ हो चुकी दुखद घटनाओं को भी अपने जीवन से अलग नहीं कर सकते, पर जिस तरह हम चीनी डाल कर शरबत का स्वाद ठीक कर सकते हैं उसी तरह पुरानी कड़वाहट और दुखों को मिटाने के लिए जिन्दगी में भी अच्छे अनुभवों की मिठास घोलनी पड़ती है।

यदि तुम अपने अतीत का ही रोना रोते रहोगे तो ना तुम्हारा वर्तमान सही होगा और ना ही भविष्य उज्जवल हो पाएगा। अध्यापक महोदय  ने अपनी बात पूरी की।

इसे भी पढ़ें : जब भी आप जिंदगी में बेहद उदास और हताश हो जाएँ तो याद रखें 10 बातें |

कमल को अब अपनी गलती का एहसास हो चुका था, उसने मन ही मन एक बार फिर अपने जीवन को सही दिशा देने का प्रण लिया।

दोस्तों, हम भी अक्सर बंद होते हुए दरवाजे की तरफ इतनी देर तक देखते रहते हैं कि हमें खुलते हुए अच्छे दरवाजों की भनक तक नहीं लगती और हमारा जीवन दुखों के सागर में ही डूबा रह जाता है, जरुरी है कि हम अपनी पुरानी गलतियों या फिर तकलीफ़ों को भूलना सीखें और जिंदगी को फिर से नयी दिशा की और मोड़ें!
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नन्हीं चिड़िया
बहुत समय पुरानी बात है, एक बहुत घना जंगल हुआ करता था| एक बार किन्हीं कारणों से पूरे जंगल में भीषण आग लग गयी| सभी जानवर देख के डर रहे थे की अब क्या होगा??

थोड़ी ही देर में जंगल में भगदड़ मच गयी सभी जानवर इधर से उधर भाग रहे थे पूरा जंगल अपनी अपनी जान बचाने में लगा हुआ था| उस जंगल में एक नन्हीं चिड़िया रहा करती थी उसने देखा क़ि सभी लोग भयभीत हैं जंगल में आग लगी है मुझे लोगों की मदद करनी चाहिए|

यही सोचकर वह जल्दी ही पास की नदी में गयी और चोच में पानी भरकर लाई और आग में डालने लगी| वह बार बार नदी में जाती और चोच में पानी डालती| पास से ही एक उल्लू गुजर रहा था उसने चिड़िया की इस हरकत को देखा और मन ही मन सोचने लगा बोला क़ि ये चिड़िया कितनी मूर्ख है इतनी भीषण आग को ये चोंच में पानी भरकर कैसे बुझा सकती है|

यही सोचकर वह चिड़िया के पास गया और बोला कि तुम मूर्ख हो इस तरह से आग नहीं बुझाई जा सकती है|

चिड़िया ने बहुत विनम्रता के साथ उत्तर दिया-“मुझे पता है कि मेरे इस प्रयास से कुछ नहीं होगा लेकिन मुझे अपनी तरफ से best करना है, आग कितनी भी भयंकर हो लेकिन मैं अपना प्रयास नहीं छोड़ूँगी”

उल्लू यह सुनकर बहुत प्रभावित हुआ|

शिक्षा/Moral:- तो मित्रों यही बात हमारे जीवन पर भी लागू होती है कि जब कोई भी परेशानी आती है तो इंसान घबराकर हार मान लेता है लेकिन हमें बिना डरे प्रयास करते रहना चाहिए यही इस कहानी की शिक्षा है।
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जो व्यक्ति दूर होते हुए भी हमाारी
          आस पास लगे
तो समझ लेना उस व्यक्ति का सबंध
   हमारी आत्मा से जुड़ा हुआ है
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सरहद नही है हम जो लकीर पर
               मिले
खुशबू ए मोहब्बत हु हर जगह मिलेंगे
            हम..... 
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इश्क तो नियत की सच्चाई देखता है
            दिल न झुके तो
       सजदे जाया मत करना
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रिश्ते बनाने के लिए बस एक पल                       चाहिए
पर उसे निभाने के लिए एक दिल
                चाहिए
खेलता तो सागर भी है लहरो से
 पर उसे भी थामने के लिए साहिल
               चाहिए
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