कन्हैया का पुत्र धर्म  

वृन्दावन के एक संत की कथा है. वे श्री कृष्ण की आराधना करते थे. उन्होंने संसार को भूलने की एक युक्ति की. 

मन को सतत श्री कृष्ण का स्मरण रहे, उसके लिए महात्मा ने प्रभु के साथ ऐसा सम्बन्ध जोड़ा की मै नन्द हुँ, 

बाल कृष्ण लाल मेरे बालक है, वे लाला को लाड़ लड़ाते, यमुना जी स्नान करने जाते तो लाला को साथ ले कर जाते. 

भोजन करने बैठते तो लाला को साथ लेकर बैठते. ऐसी भावना करते की कन्हैया मेरी गोद में बैठा है.

कन्हैया मेरे दाढ़ी खींच रहा है. श्री कृष्ण को पुत्र मानकर आनद करते.

श्री कृष्ण के उपर इनका वात्सल्य भाव था.

महात्मा श्री कृष्ण की मानसिक सेवा करते थे. 

सम्पूर्ण दिवस मन को श्री कृष्ण लीला में तन्मय रखते, जिससे मन को संसार का चिंतन करने का अवसर ही ना मिले. 

निष्क्रय ब्रह्म का सतत ध्यान करना कठिन है, परन्तु लीला विशिष्ट ब्रह्म का सतत ध्यान हो सकता है, 

महात्मा परमात्मा के साथ पुत्र का सम्बन्ध जोड़ कर संसार को भूल गये,

परमात्मा के साथ तन्मय हो गये, श्री कृष्ण को पुत्र मानकर लाड लड़ाने लगे.

महात्मा ऐसी भावना करते की कन्हैया मुझसे केला मांग रहा है, 

बाबा ! मुझे केला दो, ऐसा कह रहा है. महात्मा मन से ही कन्हैया को केला देते. 

महात्मा समस्त दिवस लाला की मानसिक सेवा करते और मन से भगवान को सभी वस्तुए देते.

कन्हैया तो बहुत भोले है. मन से तो वो भी प्रसन्न हो जाते है.

महात्मा कभी कभी शिष्यों से कहते की इस शरीर से गंगा स्नान कभी हुआ नहीं, वह मुझे एक बार कराना है. शिष्य कहते की काशी पधारो.

महात्मा काशी जाने की तैयारी करते परन्तु वात्सल्य भाव से मानसिक सेवा में तन्मय हुए की कन्हैया कहने लगते 

बाबा मै तुम्हारा बालक हुँ, छोटा सा हुँ. मुझे छोड़ कर काशी नहीं जाना. 

इस प्रकार महात्मा सेवा में तन्मय होते, उस समय उनको ऐसा आभास होता था की मेरा लाला जाने की मनाही कर रहा है.

मेरा कान्हा अभी बालक है. मैं कन्हैया को छोड़कर यात्रा करने कैसे जाऊ ? मुझे लाला को छोड़कर जाना नहीं.

महात्मा अति वृद्ध हो गये. महात्मा का शरीर तो वृद्ध हुआ परन्तु उनका कन्हैया तो छोटा ही रहा. वह बड़ा हुआ ही नहीं !

उनका प्रभु में बाल - भाव ही स्थिर रहा और एक दिन लाला का चिन्तन करते - करते वे मृत्यु को प्राप्त हो गये.

शिष्य कीर्तन करते- करते महात्मा को श्मशान ले गये. अग्नि - संस्कार की तैयारी हुई...

इतने ही में एक सात वर्ष का अति सुंदर बालक कंधे पर गंगाजल का घड़ा लेकर वहां आया. 

उसने  शिष्यों से कहा - ये मेरे पिता है, मै इनका मानस - पुत्र हुँ, पुत्र के तौर पर अग्नि - संस्कार करने का अधिकार मेरा है. 

मै इनका अग्नि-संस्कार करूँगा. 

पिता की अंतिम इच्छा पूर्ण करना पुत्र का धर्म है, मेरे पिता की गंगा-स्नान करने की इच्छा थी परन्तु मेरे कारण ये गंगा-स्नान करने नहीं जा सकते थे. 

इसलिए मै यह गंगाजल लाया हुँ, पुत्र जिस प्रकार पिता की सेवा करता है, इस प्रकार बालक ने महात्मा के शव को गंगा-स्नान कराया. 

संत के माथे पर तिलक किया, पुष्प की माला पहनाई और अंतिम वंदन करके अग्नि-संस्कार किया, 

सब देखते ही रह गये, अनेक साधु-महात्मा थे परन्तु किसी की बोलने की हिम्मत ही ना हुई. 

अग्नि- संस्कार करके बालक एकदम अंतर्ध्यान हो गया. उसके बाद लोगो को ख्याल आया की महात्मा के तो पुत्र था ही नही..!!

बाल कृष्ण लाल ही तो महात्मा के पुत्र रूप में आये थे.

महात्मा की भावना थी की श्री कृष्ण मेरा पुत्र है, परमात्मा ने उनकी भावना पूरी की,

परमात्मा के साथ जीव जैसा सम्बन्ध बांधता है, वैसा ही सम्बन्ध से परमात्मा उसको मिलते है.

जय श्रीराधे कृष्णा

जीवन के रंग

 मोहन एक न्यूज़ पेपर की दुकान चलाता था एक बुजुर्ग लगभग 60 साल के रोज उसकी दुकान पर आते तकरीबन सभी न्यूज़ पेपर उलट पलटकर देखते,

 फिर एक पेपर खरीदकर चले जाते मोहन को ये बडा अटपटा सा लगता ।
आखिर एकदिन मोहन ने बुजुर्ग से पूछ लिया -बाबूजी आप कया खोजते रहते हो रोज आकर इन पेपर मे 
,बुजुर्ग बोले-बेटा अपनी तस्वीर ....

मोहन-ओह तो आपने छपने भेजी हे कौन से पेपर मे...
बुजुर्ग बोले- नही मेरे बेटे इस आस मे शायद मेरे बेटे बहूओ को मेरी याद आये ओर तलाश शुदा के कालम मे...वो मेरी तस्वीर छाप मुझे वापस घर बुला ले ...!!

 एक बार बहू ने अपने पालतू कुत्ते का भी ऐसे ही तलाश शुदा कालम मे इशतहार दिया था....कहकर रोने लगे....

मोहन ने जब जोर देकर पूछा तो बुजुर्ग बोले -भूरेलाल नाम है उनका शहर मे बडी दुकान थी कपडे की दो बेटे है पढाया लिखाया समझदार बनाया।

 फिर पत्नी के कहने पर पहले कारोबार ओर फिर घर उनके नाम कर दिया बस सभी चीजों पर कब्जा किए बहू बेटों के बर्ताव मे होते अनदेखियो और बदतमीजी से मेरी पत्नी चल बसी ।

ओर फिर कुछ समय बाद दोनों बेटों ने मुझे इस शहर मे स्टेशन पर छोड़ दिया की आप यहां रुकिए हम अभी आते है... 

मगर वो फिर कभी नही आये शायद वो मुझे यूं ही मरने को छोड़ गए 5 दिनो तक भूखे रहकर मैंने उनकी राह देखी 

मगर फिर सबकुछ समझ गया और यूं ही भटकते इस वृद्धआश्रम आ पहुंचा ओर यहां लगभग 2साल हो गए मगर आज भी दिल करता हे शायद जैसे अपने पालतू कुत्ते के लिए विज्ञापन दिया था।

 बेटे बहुओ ने हो सकता हे मेरी तस्वीर भी दी हो की पापा वापस आ जाओ....

कहकर रोने लगे,सबकुछ सुनकर मोहन बोला-मे आपसे एक बात कहूं-मे गांवसे शहर पैसे कमाने आया हूं अपने माता पिता ओर छोटी बहन को छोडकर... 

मुझे उनकी कमी हर वक्त खलती है जैसे आपको अपने बेटोंकी तो कयूं ना आजसे आप मेरे पास मेरे साथ रहे आपको बेटा ओर मुझे पिता का प्यार मिल जाएगा, 

बुजुर्ग ये सुनकर हैरान थे मगर फिर खडे हुए और मोहन को गले लगा लिया इसके बाद मोहन और बुजुर्ग साथ रहने लगे।

दोस्तों!!
 ये भी एक रंग है संसार का कोई बेटों के होते हुए भी परेशान है ओर और कोई माता पिता की ममता ना मिलने से खुदको बदनसीब समझता है 

अपने माता पिता को प्यार और सम्मान दीजिए घरों मे बरकत कुत्ते बिल्ली के पालने से नही मां बाप की सेवा करने से होती है ।

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औरत को आईने में यूँ उलझा दिया गया
बखान करके हुश्न का बहला दिया गया

न हक़ दिया जमीन का न घर कहीं दिया
गृह स्वामिनी के नाम का रुतबा दिया गया
छूती रही जब पाँव परमेश्वर पति को कह
फिर कैसे इनको घर की गृह लक्ष्मी बना दिया

चलती रहे चक्की और जलता रहे चूल्हा
बस इसीलिए औरत को अन्नपूर्णा बना दिया

न बराबर का हक मिले न चूं ही कर सके
इसीलिए इनको पूज्य देवी दुर्गा बना दिया

यह डॉक्टर इंजीनियर सैनिक भी हो गईं
पर घर के चूल्हों ने उसे औरत बना दिया

चाँदी सोने की हथकड़ी नकेल बेड़ियाँ
कंगन पाजेब नथनिया जेवर बना दिया

व्यभिचारी आदमी जब लार रोक न सका
श्रृंगार साज बस्त्र पर तोहमत लगा दिया

खुद नंग धड़ंग आदमी घूमता है रात दिन
औरत की टांग क्या दिखी नंगा बता दिया
नारी ने जो ललकारा इस दानव प्रवर्ति को
जिह्वा निकाल रक्त प्रिय काली बना दिया

नौ माह खून सींच के पैदा जिसे किया
बेटे को नाम बाप का चिपका दिया.....
हम राम जी के 
राम जी हमारे हैं।

जो हमें समझ ही न सका उसे पूरा हक है हमें अच्छा बुरा कहने का क्योंकि जो हमे जान लेता है वो हम पर जान देता है.

Ks Songara..🙏
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एक बादशाह की आदत थी, कि वह भेस बदलकर लोगों की खैर-ख़बर लिया करता था,एक दिन अपने वज़ीर के साथ गुज़रते हुए शहर के किनारे पर पहुंचा तो देखा एक आदमी गिरा पड़ा हैl

बादशाह ने उसको हिलाकर देखा तो वह मर चुका था ! लोग उसके पास से गुज़र रहे थे, बादशाह ने लोगों को आवाज़ दी लेकिन लोग बादशाह को पहचान ना सके और पूछा क्या बात है? बादशाह ने कहा इस को किसी ने क्यों नहीं उठाया? लोगों ने कहा यह बहुत बुरा और गुनाहगार इंसान है बादशाह ने कहा क्या ये "इंसान" नहीं है? और उस आदमी की लाश उठाकर उसके घर पहुंचा दी, उसकी बीवी शौहर की लाश देखकर रोने लगी, और कहने लगी "मैं गवाही देती हूं मेरा शौहर बोहत नेक इंसान है" इस बात पर बादशाह को बड़ा ताज्जुब हुआ कहने लगा "यह कैसे हो सकता है? लोग तो इसकी बुराई कर रहे थे और तो और इसकी लाश को हाथ लगाने को भी तैयार ना थे?"

उसकी बीवी ने कहा "मुझे भी लोगों से यही उम्मीद थी, दरअसल हकीकत यह है कि मेरा शौहर हर रोज शहर के शराबखाने में जाता शराब खरीदता और घर लाकर नालियों में डाल देता और कहता कि चलो कुछ तो गुनाहों का बोझ इंसानों से हल्का हुआ, रात को एक बुरी औरत यानी वेश्या के पास जाता और उसको एक रात की पूरी कीमत देता और कहता कि अपना दरवाजा बंद कर ले, कोई तेरे पास ना आए घर आकर कहता ख़ुदा का शुक्र है,आज उस औरत और नौजवानों के गुनाहों का मैंने कुछ बोझ हल्का कर दिया, लोग उसको उन जगहों पर जाता देखते थे, मैं अपने शौहर से कहती "याद रखो जिस दिन तुम मर गए लोग तुम्हें नहलाने तक नहीं आएंगे,ना तुम्हारी नमाज-ए-जनाजा पढ़ाएंगे और ना तुम्हें दफनायेंगे वह हंसते और मुझसे कहते कि घबराओ नहीं तुम देखोगी कि मेरा जनाजा वक्त का बादशाह और नेक लोग पढ़ाएंगे..यह सुनकर बादशाह रो पड़ा और कहने लगा मैं बादशाह हूं, कल हम इसको नहलायेंगे, इसकी नमाज-ए-जनाजा भी पढ़ाएंगे और इसकी मैय्यत भी हम दफ्न करवाएंगेl

आज हम बज़ाहिर कुछ देखकर या दूसरों से कुछ सुनकर अहम फैसले कर बैठते हैं अगर हम दूसरों के दिलों के भेद जान जाएं तो हमारी ज़बाने गूंगी हो जाएं, किसी को गलत समझने से पहले देख लिया करें कि वह ऐसा है भी कि नहीं? और हमारे सही या ग़लत कहने से सही ग़लत नहीं हो जायेगा और ना जो ग़लत है वो सही हो जायेगा? हम दूसरों के बारे में फैसला करने में महज़ अपना वक़्त ज़ाया कर रहे हैं..बेहतर ये है के अपना कीमती वक़्त किसी की बुराई करने की बजाये किसी क़ीमती चीज़ को हासिल करने में लगाया जाये...ओर पढे।
भारत मे संविधान ने जो नारी/ स्त्री को दिया वो आज तक कोई भगवान क्यों नही दे सका
 👉धर्म के अनुसार सती प्रथा सही है लेकिन संविधान के अनुसार गलत 
और_प्रतिबंधित_है
👉धर्म के अनुसार नारी को शिक्षा का अधिकार नहीं है लेकिन
 संविधान_के_अनुसार_है
👉धर्म ने नारी को समानता का अधिकार नहीं दिया लेकिन
 संविधान_ने_दिया_है
👉धर्म विधव महिला को दूसरा शादी करने का इजाजत नहीं देता है 
लेकिन_संविधान_देता_है
👉धर्म ने नारी को हर रूप मे पुरुषों का गुलाम बना रखा है लेकिन 
संविधान_ने_हर_रूप_में_स्वतंत्रता_दी_है
👉धर्म ने महिलाओं को बहुत से धर्म स्थल में जाने की इजाजत नहीं दी
लेकिन_सविधान_ने_दी_है
👉धर्म ने देवदासी जैसी कई कुप्रथाओं से महिलाओं का खूब शोषण किया लेकिन संविधान ने कुप्रथाओं पर प्रतिबंध लगाकर महिलाओं को भी सम्मानित जीवन जीने का अधिकार दिया
अब महिलाओं को तय करना है कि उनका हित किसमें है
🚩!! जय माँ गायत्री जी !!🚩
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गायत्री मंत्र में छि‍पा है हर परेशानी का हल - गायत्री मंत्र (वेद ग्रंथ की माता) को हिन्दू धर्म में सबसे उत्तम मंत्र माना जाता है। जानें क्या हैं इसका उच्चारण करने के फायदे...
गायत्री मंत्र :~ प्रिय बन्धुओं एवं मित्रों चारों वेदों से मिलकर बने गायत्री मंत्र का उच्‍चारण करने से व्‍यक्ति के जीवन में खुशियों का संचार होता है। इस मंत्र का जाप करने से शरीर निरोग बनता है और इंसान को यश, प्रसिद्धि और धन की प्राप्ति भी होती है।

!! गायत्री मंत्र !!
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ॐ भूर्भुवः स्वः
तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्यः धीमहि
धियो यो नः प्रचोदयात्।।

गायत्री मंत्र का अर्थ :~
भगवान सूर्य की स्तुति में गाए जाने वाले इस मंत्र का अर्थ निम्न है... उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अन्तःकरण में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।

मंत्र के प्रत्येक शब्द की व्याख्या :~
गायत्री मंत्र के पहले नौ शब्द प्रभु के गुणों की व्याख्या करते हैं...
ॐ = प्रणव,
भूर = मनुष्य को प्राण प्रदाण करने वाला,
भुवः = दुख़ों का नाश करने वाला,
स्वः = सुख़ प्रदाण करने वाला,
तत = वह, 
सवितुर = सूर्य की भांति उज्जवल,
वरेण्यं = सबसे उत्तम,
भर्गो = कर्मों का उद्धार करने वाला,
देवस्य = प्रभु,
धीमहि = आत्म चिंतन के योग्य (ध्यान),
धियो = बुद्धि, 
यो = जो, 
नः = हमारी,
प्रचोदयात् = हमें शक्ति दें (प्रार्थना)।

कब करें गायत्री मंत्र का जाप :~
यूं तो इस बेहद सरल मंत्र को कभी भी पढ़ा जा सकता है लेकिन शास्त्रों के अनुसार इसका दिन में तीन बार जप करना चाहिए...
- प्रात:काल सूर्योदय से पहले और सूर्योदय के पश्चात तक।
- फिर दोबारा दोपहर को।
- फिर शाम को सूर्यास्त के कुछ देर पहले जप शुरू करना चाहिए।

गायत्री मंत्र के फायदे :~
सनातन हिन्दू-धर्म में गायत्री मंत्र को विशेष मान्यता प्राप्त है. कई शोधों द्वारा यह भी प्रमाणित किया गया है कि गायत्री मंत्र के जाप से कई फायदे भी होते हैं जैसे : मानसिक शांति, चेहरे पर चमक, खुशी की प्राप्ति, चेहरे में चमक, इन्द्रियां बेहतर होती हैं, गुस्सा कम आता है और बुद्धि तेज होती है। श्री वेदमाता जी की कृपा आप सभी पे सर्वदा बनी रहे।ओर पढे।

एक धनी सेठ के सात बेटे थे..
छः का विवाह हो चुका था। सातवीं बहू आयी, वह सत्संगी माँ-बाप की बेटी थी। बचपन से ही सत्संग में जाने से सत्संग के सुसंस्कार उसमें गहरे उतरे हुए थे। छोटी बहू ने देखा कि घर का सारा काम तो नौकर चाकर करते हैं, जेठानियाँ केवल खाना बनाती हैं उसमें भी खटपट होती रहती है। बहू को सुसंस्कार मिले थे कि अपना काम स्वयं करना चाहिए और प्रेम से मिलजुल कर रहना चाहिए। अपना काम स्वयं करने से स्वास्थ्य बढ़िया रहता है।*
*उसने युक्ति खोज निकाली और सुबह जल्दी स्नान करके, शुद्ध वस्त्र पहनकर पहले ही रसोई में जा बैठी। जेठानियों ने टोका लेकिन फिर भी उसने बड़े प्रेम से रसोई बनायी और सबको प्रेम से भोजन कराया। सभी बड़े तृप्त व प्रसन्न हुए।*
*दिन में सास छोटी बहू के पास जाकर बोलीः "बहू ! तू सबसे छोटी है, तू रसोई क्यों बनाती है ? तेरी छः जेठानियाँ हैं।"*
*बहूः "माँजी ! कोई भूखा अतिथि घर आ जाय तो उसको आप भोजन क्यों कराते हो ?"*
*"बहू ! शास्त्रों में लिखा है कि अतिथि भगवान का स्वरूप होता है। भोजन पाकर वह तृप्त होता है तो भोजन कराने वाले को बड़ा पुण्य मिलता है।"*
*"माँजी ! अतिथि को भोजन कराने से पुण्य होता है तो क्या घरवालों को भोजन कराने से पाप होता है ? अतिथि में भगवान का स्वरूप है तो घर के सभी लोग भी तो भगवान का स्वरूप है क्योंकि भगवान का निवास तो जीवमात्र में है। और माँजी ! अन्न आपका, बर्तन आपके सब चीजें आपकी हैं, मैं जरा सी मेहनत करके सबमें भगवदभाव रखके रसोई बनाकर खिलाने की थोड़ी-सी सेवा कर लूँ तो मुझे पुण्य होगा कि नहीं होगा ? सब प्रेम से भोजन करके तृप्त होंगे, प्रसन्न होंगे तो कितना लाभ होगा ! इसलिए माँजी ! आप रसोई मुझे बनाने दो। कुछ मेहनत करूँगी तो स्वास्थ्य भी बढ़िया रहेगा।"*
*सास ने सोचा कि ʹबहू बात तो ठीक कहती है। हम इसको सबसे छोटी समझते हैं पर इसकी बुद्धि सबसे अच्छी है।ʹ*
*दूसरे दिन सास सुबह जल्दी स्नान करके रसोई बनाने बैठ गयी। बहुओं ने देखा तो बोलीं- "माँजी ! आप परिश्रम क्यों करती हो ?"*
*सास बोलीः "तुम्हारी उम्र से मेरी उम्र ज्यादा है। मैं जल्दी मर जाऊँगी। मैं अभी पुण्य नहीं करूँगी तो फिर कब करूँगी ?"*
*बहुएँ बोलीं- "माँजी ! इसमें पुण्य क्या है ? यह तो घर का काम है।"*
*सास बोलीः "घर का काम करने से पाप होता है क्या ? जब भूखे व्यक्तियों को, साधुओं को भोजन कराने से पुण्य होता है तो क्या घरवालों को भोजन कराने से पाप होता है ? सभी में ईश्वर का वास है।"*
*सास की बातें सुनकर सब बहुओं को लगा कि ʹइस बात का तो हमने कभी ख्याल ही नहीं किया। यह युक्ति बहुत बढ़िया है !ʹ अब जो बहू पहले जग जाय वही रसोई बनाने बैठ जाये। पहले जो भाव था कि ʹतू रसोई बना....ʹ तो छः बारी बँधी थीं लेकिन अब ʹमैं बनाऊँ, मैं बनाऊँ...ʹ यह भाव हुआ तो आठ बारी बँध गयीं। दो और बढ़ गये सास और छोटी बहू। काम करने में ʹतू कर, तू कर....ʹ इससे काम बढ़ जाता है और आदमी कम हो जाते हैं पर ʹमैं करूँ, मैं करूँ....ʹ इससे काम हलका हो जाता है और आदमी बढ़ जाते हैं।*
*छोटी बहू उत्साही थी, सोचा कि ʹअब तो रोटी बनाने में चौथे दिन बारी आती है, फिर क्या किया जाय ?ʹ घर में गेहूँ पीसने की चक्की पड़ी थी, उसने उससे गेहूँ पीसने शुरु कर दिये। मशीन की चक्की का आटा गर्म-गर्म बोरी में भर देने से जल जाता है, उसकी रोटी स्वादिष्ट नहीं होती लेकिन हाथ से पीसा गया आटा ठंडा और अधिक पौष्टिक होता है तथा उसकी रोटी भी स्वादिष्ट होती है। छोटी बहू ने गेहूँ पीसकर उसकी रोटी बनायी तो सब कहने लगे की ʹआज तो रोटी का जायका बड़ा विलक्षण है !ʹ*
*सास बोलीः "बहू ! तू क्यों गेहूँ पीसती है ? अपने पास पैसों की कमी नहीं है।"*
*"माँजी ! हाथ से गेहूँ पीसने से व्यायाम हो जाता है और बीमारी नहीं आती। दूसरा, रसोई बनाने से भी ज्यादा पुण्य गेहूँ पीसने का है।"*
*सास और जेठानियों ने जब सुना तो लगा कि बहू ठीक कहती है। उन्होंने अपने-अपने पतियों से कहाः ʹघर में चक्की ले आओ, हम सब गेहूँ पीसेंगी।ʹ रोजाना सभी जेठानियाँ चक्की में दो ढाई सेर गेहूँ पीसने लगीं।*
*अब छोटी बहू ने देखा कि घर में जूठे बर्तन माँजने के लिए नौकरानी आती है। अपने जूठे बर्तन हमें स्वयं साफ करने चाहिए क्योंकि सबमें ईश्वर है तो कोई दूसरा हमारा जूठा क्यों साफ करे !*
*अगले दिन उसने सब बर्तन माँज दिये। सास बोलीः "बहू ! विचार तो कर, बर्तन माँजने से तेरा गहना घिस जायेगा, कपड़े खराब हो जायेंगे...।"*
*"माँजी ! काम जितना छोटा, उतना ही उसका माहात्म्य ज्यादा। पांडवों के यज्ञ में भगवान श्रीकृष्ण ने जूठी पत्तलें उठाने का काम किया था।"*
*दूसरे दिन सास बर्तन माँजने बैठ गयी। उसको देख के सब बहुओं ने बर्तन माँजने शुरु कर दिये।*
*घर में झाड़ू लगाने नौकर आता था। अब छोटी बहू ने सुबह जल्दी उठकर झाड़ू लगा दी। सास ने पूछाः "बहू ! झाड़ू तूने लगायी है ?"*
*"माँजी ! आप मत पूछिये। आपको बोलती हूँ तो मेरे हाथ से काम चला जाता है।"*
*"झाड़ू लगाने का काम तो नौकर का है, तू क्यों लगाती है ?"*
*"माँजी ! ʹरामायणʹ में आता है कि वन में बड़े-बड़े ऋषि-मुनि रहते थे लेकिन भगवान उनकी कुटिया में न जाकर पहले शबरी की कुटिया में गये। क्योंकि शबरी रोज चुपके-से झाड़ू लगाती थी, पम्पासरोवर का रास्ता साफ करती थी कि कहीं आते-जाते ऋषि-मुनियों के पैरों में कंकड़ न चुभ जायें।"*
*सास ने देखा कि यह छोटी बहू तो सबको लूट लेगी क्योंकि यह सबका पुण्य अकेले ही ले लेती है। अब सास और सब बहुओं ने मिलके झाड़ू लगानी शुरू कर दी।*
*जिस घर में आपस में प्रेम होता है वहाँ लक्ष्मी बढ़ती है और जहाँ कलह होता है वहाँ निर्धनता आती है। सेठ का तो धन दिनोंदिन बढ़ने लगा। उसने घर की सब स्त्रियों के लिए गहने और कपड़े बनवा दिये। अब छोटी बहू ससुर से मिले गहने लेकर बड़ी जेठानी के पास गयी और बोलीः "आपके बच्चे हैं, उनका विवाह करोगी तो गहने बनवाने पड़ेंगे। मेरे तो अभी कोई बच्चा है नहीं। इसलिए इन गहनों को आप रख लीजिये।"*
*गहने जेठानी को देकर बहू ने कुछ पैसे और कपड़े नौकरों में बाँट दिये। सास ने देखा तो बोलीः "बहू ! यह तुम क्या करती हो ? तेरे ससुर ने सबको गहने बनवाकर दिये हैं और तूने वे जेठानी को दे दिये और पैसे, कपड़े नौकरों में बाँट दिये !"*
*"माँजी ! मैं अकेले इतना संग्रह करके क्या करूँगी ? अपनी वस्तु किसी जरूरतमंद के काम आये तो आत्मिक संतोष मिलता है और दान करने का तो अमिट पुण्य होता ही है !"*
*सास को बहू की बात लग गयी। वह सेठ के पास जाकर बोलीः "मैं नौकरों में धोती-साड़ी बाँटूगी और आसपास में जो गरीब परिवार रहते हैं उनके बच्चों को फीस मैं स्वयं भरूँगी। अपने पास कितना धन है, किसी के काम आये तो अच्छा है। न जाने कब मौत आ जाय और सब यहीं पड़ा रह जाय ! जितना अपने हाथ से पुण्य कर्म हो जाये अच्छा है।"*
*सेठ बहुत प्रसन्न हुआ कि पहले नौकरों को कुछ देते तो लड़ पड़ती थी पर अब कहती है कि ʹमैं खुद दूँगी।ʹ सास दूरसरों को वस्तुएँ देने लगी तो यह देख के दूसरी बहुएँ भी देने लगीं। नौकर भी खुश हो के मन लगा के काम करने लगे और आस-पड़ोस में भी खुशहाली छा गयी।*राम राम जी
*ʹगीताʹ में आता हैः*
*यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।*
*स यत्प्रमाणं कुरूते लोकस्तदनुवर्तते।।*
*ʹश्रेष्ठ मनुष्य जो-जो आचरण करता है, दूसरे मनुष्य वैसा-वैसा ही करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, दूसरे मनुष्य उसी के अनुसार आचरण करते हैं।ʹ*
*छोटी बहू ने जो आचरण किया उससे उसके घर का तो सुधार हुआ ही, साथ में पड़ोस पर भी अच्छा असर पड़ा, उनके घर में भी सुधर गये। देने के भाव से आपस में प्रेम-भाईचारा बढ़ गया। इस तरह बहू को सत्संग से मिली सूझबूझ ने उसके घर के साथ अनेक घरों को खुशहाल कर दिया !ओर पढ़े।

प्राप्त काल पानी पिये
              घुट घुट कर आप
बस दो तीन गिलास हैं।
                  हर ओषधि का बाप
जो अमृत पीते हैं उन्हें देव कहते हैं 
और जो विष पीते हैं उन्हें देवों के देव.. 
"महादेव" कहते हैं ... !!

♨ ॐ नमः शिवाय ♨
भोलेनाथ आपकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण करे.....
ॐ_नमः_शिवाय 
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 तुम घुमाना प्रेमिका को,हम भोलेनाथ को रिझाएंगे

तुम निभाना वेलेंटाइन हम तो सवान  मनायेंगे,जय जय भोले।ओर पढे
शिल्प छेनी से करे सपनो को साकार
अनगढ़ पत्थर से रचें मनचाहा आकर।
माटी रखकर चाक पर घड़ा घड़े कुम्हार,
श्रेष्ठ गुरु मिल जाये तो शिष्य पाये संस्कार,ओर पढे।
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दुष्ट के साथ दुष्टता का ही व्यवहार करना चाहिए
इसमें कोई बुराई नही है।ओर पढे।
                               चाणक्य नीति।
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हर मित्रता के पीछे कोई ना कोई  स्वार्थ होता हैं 
ऐसी कोई मित्रता नही जिसमें स्वार्थ ना हो। यह कड़वा सच है।ओर पढे।
                               चाणक्य नीति।
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जो मनुष्य अपने वर्ग के लोगो को छोड़कर
दूसरे वर्ग का सहारा लेता हैं
वह उसी प्रकार स्वयं नष्ट हो जाता हैं
जैसे अधर्म का आश्रय लेने वाला राजा।ओर पढे
                               चाणक्य नीति।
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जिस व्यक्ति के पास पैसा है
        लोग स्वयं ही उसके मित्र बन जाते हैं।ओर पढे।
                               चाणक्य नीति।
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